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विशेषज्ञ लेख
जाने सुपारी की खेती कैसे करें ?

कर्नाटक,महाराष्ट्र,आंध्र प्रदेश और अन्य कई राज्यों के किसान अच्छे मुनाफे और लाभ के लिए सुपारी की खेती की योजना बना रहे हैं । क्या आप सुपारी की फसल लगाने में रुचि रखते हैं? यदि हा तो कृपया नीचे बताये गए महत्वपूर्ण सुझाव पढ़े।

उचित मिट्टी और जलवायु परिस्थितियाँ:-

उचित मिट्टी और जलवायु परिस्थितियाँ:-

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सुपारी का पौधा १५ से ३५ डिग्री सेल्सियस के तापमान के बिच अच्छे से विकसित होता है,यदि तापमान १० डिग्री सेल्सियस से कम या ४० डिग्री सेल्सियस से अधिक होता है तो यह पौधो के विकास पर विपरीत प्रभाव डालता है, सुपारी की फसल अधिक तापमान और जल ठहराव जैसी परिस्तिथि के प्रति बहुत सवेंदनशील होती है।

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खेती योग्य किस्में

खेती योग्य किस्में

कुछ मान्यता प्राप्त स्थानीय किस्मे जैसे तीर्थहल्ली लोकल, साउथ केनरा लोकल, श्रीवर्धन और हिरेहल्ली जो स्थानीय पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल होती हैं, और जिन्हे आमतौर पूर्ण विकसित होने और फल देने में लगभग ६ वर्षो का समय लगता हैं।

लेकिन कुछ उन्नत किस्में हैं,जो विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित की गई हैं, जिसमे फल सामान आकार के और जल्दी आते है, और इनकी उपज क्षमता भी बेहतर होती हैं।

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स्थान के अनुसार उपयुक्त किस्में

स्थान के अनुसार उपयुक्त किस्में

➥ तटीय जलवायु: मंगला, सुमंगला, श्रीमंगला, सर्वमंगला, विट्टल अरेका, हाइब्रिड1 और 2

➥ पश्चिम बंगाल: मोहित नगर

➥ असम और उत्तर पूर्व: कहिकुची (विटीएल-६४)

➥ अंडमान निकोबार: कालीकट- १७

पौधे कैसे लगाए

पौधे कैसे लगाए

सुपारी के पौधो को केवल बीजों से ही लगाया जा सकता है, आगे जाने के लिए नीचे दिए गए चरणों का पालन को पढ़े ।

.मदर पाम का चयन

.मदर पाम का चयन

इसमें फूल जल्दी आते हैं, और पत्तियों की संख्या भी अधिक होती है, अन्तः गांठे और उच्च फल उत्पादन, मदर पाम के की आदर्श लक्षण होते है,और उन्हें कीटों और बीमारियों से मुक्त होना चाहिए, और मध्यम आयु वर्ग का होना चाहिए।

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सुपारी के बीज का चयन

सुपारी के बीज का चयन

बीज पूरी तरह से पके हुए होना चाहिए जिनका वजन ३५ ग्राम से अधिक हो उनका चयन करना चाहिए, जो उस वर्ष की दूसरी या तीसरी फसल के दौरान पेड़ के बीच के गुच्छे में से बीजो का चयन करना चाहिए। यदि इन बीजो को पानी पर तैराया जाये तो बीजो को ऊपर की ओर इशारा करते हुए कैलीक्स-एंड के साथ लंबवत तैरना चाहिए। इस प्रकार के बीज तेजी से और स्वस्थ पौधे को विकसित करते है।

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नर्सरी प्रबंधन

नर्सरी प्रबंधन

चयनित साबुत बीज को कटाई के तुरंत बाद नर्सरी या क्यारी में १० सेमी की दुरी पर बोये जाना चाहिए, और रोजाना पानी देना चाहिए।बीजो को लंबवत रूप से बोया जाना चाहिए, जिसमें कैलिक्स-एंड (डंठल वाला हिस्सा ) ऊपर की ओर होना चाहिए, और उसके ऊपर रेत की एक पतली परत से ढक देना चाहिए, और नर्सरी क्यारी को धान के भूसे या सुपारी के पत्ते से ढक देना चाहिए ।उसके ३ महीने के बाद अंकुरों को ३०३० सेमी की दूरी पर दूसरी नर्सरी या क्यारी में प्रत्यारोपित किया जाना चाहिए, या इन अंकुरों को सीधे १५० गेज की २५१५ सेमी आकार की पॉलीथिन बैग में लगाना चाहिए, इस बेग में मिट्टी के साथ, गोबर खाद, रेत ७:३:२ के अनुपात में भरना चाहिए . पौधो को हमेशा छाया में रखना चाहिए, और नियमित रूप से सिंचाई करनी चाहिए।

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पौधे का चयन

पौधे का चयन

पॉलीथिन बैग में उगाए गए बीज मुख्य खेत में अच्छी तरह से स्थापित हो जाते हैं, १२ से १६ महीने पुराने ५ या अधिक पत्तियों वाले “कम ऊंचाई” और “अधिक मूल-संधि परिधि” वाले पौधो को रोपण के लिए चुना जाना चाहिए।

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पौधों के बीच अंतर

पौधों के बीच अंतर

आम तौर पर पौधो के बिच ९ x ९ फीट का अंतर रखना चाहिए, इस तरह लगभग ५३८ पौधे प्रति एकड़ लगाए जा सकते हैं, इसके अलावा दो पंक्ति के बीच १० फीट और पौधे के बीच ८ से १० फीट का अंतर रखा जा सकता है, अतः फसल लेने के लिए इसी अन्तर के अनुसार पौधे लगाना चाहिए।

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रोपण के लिए उचित मौसम

रोपण के लिए उचित मौसम

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आमतौर पर मई से जून के बीच मानसून बारिश के शुरुवाती चरण में रोपण किया जाता है। और बहुत तीव्र मानसूनी वर्षा वाले क्षेत्रों जैसे पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में और खराब जल निकासी वाले क्षेत्रों में, रोपण सितंबर से अक्टूबर महीने में किया जाना चाहिए, और बारिश शुरू होने तक नियमित रूप से सिंचाई की जानी चाहिए।

पौधो को छाया प्रदान करना

पौधो को छाया प्रदान करना

सुपारी के पौधे तेज धूप के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। इसलिए तेज धूप से बचाने के लिए (12 बजे से शाम 4 बजे) लिए लकड़ी के टुकड़े की मदद से सुपारी की पत्ती का उपयोग किया जाना चाहिए। सिर्फ धूप से बचाव जरुरी होता है, लेकिन हवा प्रवाह के लिए किनारो को खुला रखना चाहिए, अन्तः फसल अपना कर, जैसे केले के पौधो को लगा कर भी छाया प्रदान की जा सकती है।

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पोषक तत्वों की आवश्यकता और प्रबंधन

पोषक तत्वों की आवश्यकता और प्रबंधन

सुपारी एक बारहमासी फसल है, इसलिए इसे सालभर खाद की आवश्यकता होती है, जो २ या ३ भागो में विभाजित कर के दी जानी चाहिए जिसमे एनपीके १००:४०:१४० को १०० ग्राम नाइट्रोजन (२२० ग्राम यूरिया), ४० ग्राम फॉस्फोरस (२०० ग्राम रॉक फॉस्फेट) और १४० ग्राम पोटेशियम (२३५ ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश) १२ किलो हरी खाद और गोबर की खाद के साथ मिला कर दिया जाना चाहिए।

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फसल के बीच किये जाने वाले कार्य

फसल के बीच किये जाने वाले कार्य

अक्टूबर-नवंबर के महीने में मानसून की बारिश समाप्त होने के बाद, निराई की जानी चाहिए, और कठोर मिट्टी की सतह को तोड़ने के लिए हल्की खुदाई / जुताई की जानी चाहिए, मिट्टी के आधार पर 2 साल में एक बार इस हल्की जुताई के दौरान चूना या जिप्सम मिलाना चाहिए, जिसे मिट्टी का पीएच एक सामान बना रहे।

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सिंचाई

सिंचाई

यदि सुपारी की खेती मिश्रित फसल प्रणाली के साथ कर रहे है, और यदि पानी की पर्याप्त उपलब्धता हो तो स्प्रिंकलर(फव्वारा) सिंचाई प्रणाली अच्छी होती है। लेकिन यदि पानी की कमी हो विशेष रूप से गर्मी के मौसम में तो टपक सिंचाई का उपयोग करना चाहिए, टपक सिंचाई के उपयोग से १/१० पानी की बचत हो सकती है, एक बार टपक सिंचाई स्थापित होने पर आवश्यक एनपीके और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों को १० भागों में विभाजित करके पानी के साथ दिया जा सकता है, और बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए नवंबर से मई तक २० दिनों में अन्तराल में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।

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इंटरक्रॉपिंग/मिश्रित फसल

इंटरक्रॉपिंग/मिश्रित फसल

रोपण के बाद शुरुआती ५ वर्षों के दौरान केले की फसल मिश्रित फसल प्रणाली के साथ की जा सकती है, क्योंकि यह सुपारी के पौधो को अच्छी छाया भी प्रदान करता है, इसके अलावा सब्जियों, फूलों के पौधे, औषधीय पौधों और फलियों वाली फसल को मिश्रित फसल प्रणाली के शुरुआती ५ वर्षों के दौरान उपयोग किया जा सकता है।

अन्तः फसल द्वारा खरपतवार को नियंत्रित किया जा सकता है, और इसका उपयोग हरे चारे और मल्चिंग में किया जा सकता है, सुपारी के पेड़ लगाने के ५ साल बाद, काली मिर्च, वेनिला जैसी फसलों को पेड़ के आधार पर लगाकर सुपारी के पेड़ का सहारा देकर अन्तः फसल चक्र के रूप में लगाया जा सकता है, जलवायु परिस्थितियों के आधार पर केला, नींबू, संतरा, कोको, इलायची, कॉफी जैसी फसलों को सुपारी के पौधो के बीच लगाकर उगाया जा सकता है, बाग की सीमाओं पर लकड़ी के पेड़, सदाबहार फलों के पेड़, मसाले के पेड़ और नारियल के पेड़ उगाए जा सकते हैं।

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कटाई

कटाई

रोपण के बाद ३ साल तक पहले आने वाले फूलो को हटा दिया जाना चाहिए, ताकि पौधे की वानस्पतिक वृद्धि अच्छी हो सके। शुरुआती वर्षों में पौधो की कटाई लंबे डंडे से की जा सकती है, लेकिन जब पौधे पूर्ण विकसित हो जाए तो पेड़ों से कटाई के लिए कुशल व्यक्तियों की जरूरत होती है जो प्रति दिन १०० पेड़ों से कटाई कर सके। सुपारी के पेड़ अच्छे रख-रखाव वाले बागों में ७ वें वर्ष से ४० वें वर्ष तक अच्छी उपज देते हैं, क्योकि ४० वर्षों के बाद पेड़ की उपज कम हो जाती है, और रखरखाव की लागत को देखते हुए किफायती नहीं होती है। जब पेड़ पुराना हो जाए तो पुराने पेड़ के बगल में एक नया पौधा लगाया जाना चाहिए, और एक बार जब नया पौधा उपज देना शुरू कर देता है, तो पुराने गैर-लाभकारी पेड़ को काट देना चाहिए।

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उपज और प्रौद्योगिकी

उपज और प्रौद्योगिकी

उपज बाग में पोषक तत्वों के प्रबंधन और कीटों और रोगों के नियंत्रण पर निर्भर करती है। साथ ही उपज की मात्रा सुपारी के फल की कटाई के चरण और तरीको के आधार पर भिन्न होती है। सुपारी प्रसंस्करण के २ मुख्य प्रकार हैं।

1 कालीपाक: इस प्रकार की विधि का उपयोग कर्नाटक और केरल में किया जाता है। जिसमे कटे हुए कोमल हरे फलो पर से कटाई के तुरंत बाद का आवरण हटा दिया जाता है, और गुठली को आधा काट दिया जाता है, फिर इसे पानी में ३ से ४ घंटे तक उबाला जाता है, इस पानी का उपयोग २ से ३ बार फलो को उबालने के लिए किया जा सकता है, इस पानी को “काली” या “चोगरू” कहां जाता है, , फिर इन गुठलियों ५ से ७ दिनों तक धूप में सुखाया जाता है, उसके बाद आकर के अनुसार छाट कर बेचा जा सकता है या बाजार के अनुसार मूल्य बढ़ने तक संग्रहीत कर के रखा जा सकता है,काटे गए हरे कोमल फलो के परिपक्वता के आधार पर, १०० किग्रा कच्ची सुपारी से १३ से १७ किग्रा सुपारी प्राप्त की जा सकती है।

  1. चाली: इस प्रकार की विधि केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र के तटीय भागों और पूरे असम और पश्चिम बंगाल में इस्तेमाल की जाती है। काटे गए पके फलो को को सीधे धूप में ४० से ४५ दिनों तक अच्छी तरह सुखाया जाता है, ध्यान रखे सुपारी अंदर से हमेशा सफेद होनी चाहिए। बारिश या गलत तरीको से फल को सुखाने से या नमी के संपर्क में आने से सफेद गिरी, भूसी और काली पड़ जाती है। अच्छी तरह से सूखे फलो से सुपारी को अलग कर वर्गीकृत कर लेना चाहिए,और इसे चालीस के रूप में बेचा जाता है। इस प्रकार प्रति एकड़ औसतन २,००० किलो चालीसी प्राप्त की जा सकती है।

सुपारी में होने वाले रोग और उनकी रोकथाम हम अगले भाग में प्रकाशित करेंगे। कृपया हमारे साथ बने रहे।

इस लेख को पढ़ने के लिए धन्यवाद, हमें उम्मीद है कि आप लेख को पसंद करने के लिए ♡ के आइकन पर क्लिक करेंगे और लेख को अपने दोस्तों और परिवार के साथ भी साझा करेंगे!

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