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विशेषज्ञ लेख
ब्रोकली की खेती की तकनीक

ब्रोकली ठंडी के मौसम की एक महत्वपूर्ण सब्जी है, जिसका अंतिम शीर्ष खाने योग्य होता हैं। ताजा ब्रोकली एक उच्च गुणवत्ता, अत्यधिक पौष्टिक सब्जी है, जिसमे उच्च मात्रा में विटामिन (ए और सी) और खनिज (कैल्शियम, फॉस्फोरस, मैग्नीशियम, जिंक) होते हैं। यह सबसे लोकप्रिय फ्रोजन सब्जियों में से एक है।

जलवायु और मिट्टी

जलवायु और मिट्टी

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ब्रोकली ठंडे मौसम की सब्जी है, जो ठंडी और नम जलवायु में सबसे अच्छी होती है। यह बहुत कम और उच्च तापमान के प्रति बहुत संवेदनशील होती है। १७ से २३ डिग्री सेल्सियस के बीच औसत दैनिक तापमान में ब्रोकली सबसे अच्छी तरह बढ़ती है। ब्रोकोली मध्यम से भारी अच्छी जल निकास वाली मिट्टी जिसमे कार्बनिक पदार्थ अच्छी मात्रा में हो जिसमे नमी रहती हो तेजी से विकास करती है, सूखी मिट्टी में अंकुर अधिक रेशेदार हो जाते हैं। अच्छे विकास के लिए मिट्टी का पीएच ५.० - ६.५ के बिच फसल के लिए अच्छा होता हैं।

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भूमि की तैयारी

भूमि की तैयारी

खेत तैयार करने के लिए खेत की एक या दो बार गहरी जुताई करें, फिर एक बार आडी तिरछी जुताई करें, जुताई करते समय ८ टन प्रति एकड़ की दर से गोबर खाद का इस्तेमाल करें ब्रोकली को ऊंची उठी क्यारी पर या समतल जमीन पर बोया जा सकता है, भारी मिट्टी में ऊंची उठी क्यारी में बोया जा सकता है, जैविक खाद या वर्मीकम्पोस्ट के प्रयोग से पौधे की वृद्धि, उत्पादकता में सुधार होता हैं, और खेत की मिट्टी की जल धारण क्षमता में सुधार होता है। फफूंद रोगो से बचाव के लिए बुवाई से १५- २० दिन पहले नर्सरी की मिट्टी को फॉर्मेलिन १:४९ के मिश्रण से भिगो कर प्लास्टिक की पन्नी से ढक देना चाहिए, कुछ दिन बाद इन क्यरिओ को दोबारा खोद कर ५ से ६ दिन के लिए खुला छोड़ देना चाहिए, जिसे बीजो पर फॉर्मेलिन का कोई हानिकारक प्रभाव ना पडे।

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रोपण का मौसम

रोपण का मौसम

नर्सरी में बीज बोने का सबसे अच्छा समय अगस्त के मध्य से सितंबर के मध्य तक होता है। नर्सरी में बुवाई के एक महीने बाद बीज खेत में रोपाई के लिए तैयार हो जाते हैं। बोल्टिंग और बटनिंग ( फूलो के परिपक्व होने से पहले फूल फट कर गिर जाते है) से बचने के लिए नर्सरी को सही समय पर बोने की सलाह दी जाती है।

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फसल के बिच उचित अंतर और बीज दर

फसल के बिच उचित अंतर और बीज दर

ब्रोकोली की सफल खेती के लिए पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे के बीच ४५ × ४५ सेमी की दूरी का पालन किया जाना चाहिए। एक एकड़ क्षेत्र में ब्रोकली की खेती के लिए २५०- २७० ग्राम बीज दर पर्याप्त होती है।

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पोषक तत्व प्रबंधन

पोषक तत्व प्रबंधन

ब्रोकोली में खाद और उर्वरक की आवश्यकता मिट्टी की उर्वरता की स्थिति पर निर्भर करती है। खेत की तैयारी के दौरान ८ टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर खाद और ४० किलो नाइट्रोजन, ३० किलो फॉस्फोरस और २० किलो पोटैशियम प्रति एकड़ डालें। नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फॉस्फोरस और पोटैशियम की पूरी मात्रा रोपाई से पहले देनी चाहिए। नाइट्रोजन की बची हुई शेष मात्रा दो बराबर भागों में बाट कर रोपाई के एक महीने बाद और सिर बनने के समय उपयोग करना चाहिए।

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खरपतवार नियंत्रण

खरपतवार नियंत्रण

ब्रोकली के खेत में खुरपी या कुदाल से उथली निराई-गुड़ाई करनी चाहिए, ताकि युवा खरपतवारों को नष्ट किया जा सके, और मिट्टी की गीली रहे, चूंकि यह एक उथली जड़ वाली फसल है, इसलिए जड़ों को चोट से बचाने के लिए ५-६ सेमी की गहराई से अधिक गोडाई नहीं करनी चाहिए, इसलिए खेत में पौधे लगते ही निराई-गुड़ाई शुरू कर देनी चाहिए। रोपाई के चार से पांच सप्ताह बाद खेत में पौधों पर थोड़ी मिट्टी चढ़ा देना चाहिए।

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जल प्रबंधन

जल प्रबंधन

ब्रोकली के पौधों की एकसमान और निरंतर वृद्धि के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई रोपाई के तुरंत बाद करनी चाहिए। पहली सिंचाई हल्की होनी चाहिए ताकि नए रोपे गए पौधों को नुकसान न हो। बाद की सिंचाई ग्रीष्मकाल में ७ - ८ दिनों के अन्तराल पर तथा शीतकाल में १० -१५ दिनों के अन्तर पर मिट्टी की किस्म और मौसम के आधार पर दी जा सकती है। सिर बनने के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए।

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रोग से सुरक्षा

रोग से सुरक्षा

माहू

माहू

माहू आमतौर पर पत्तियों की निचली सतह पर देखे जाते हैं। पीले हरे रंग की इल्ली और लार्वा कोशिकाओ का रस चूसते हैं, और पौधों को कमजोर कर देते हैं, प्रभावित पौधे के हिस्से फीके पड़ और विकृत हो जाते हैं।

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हीरक प्रष्ट पतंगा

हीरक प्रष्ट पतंगा

यह ब्रोकोली सहित गोभी वर्ग की फसलों में सबसे गंभीर कीट है। यह हरे या भूरे रंग की इल्ली होती है जो छेद बनाकर, पारदर्शी त्वचीय धब्बे बनाती हैं, और पत्तिओ को खाती हैं, गंभीर स्तिथि में प्रभावित पत्तियाँ पूरी तरह से कंकालयुक्त हो जाती हैं।

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काला सड़न

काला सड़न

यह ब्रोकली को प्रभावित करने वाली सबसे गंभीर बीमारी है। यह रोग गर्म और आर्द्र जलवायु वाले क्षेत्रों में आम है। काला सड़न रोग के विशिष्ट लक्षण स्थानीय संक्रमण के कारण होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप जीवाणु पत्ती के किनारों के माध्यम से पत्तियों में प्रवेश करते हैं। जिस कारण संक्रमित ऊतक हल्का हरा-पीला हो जाता है, और फिर भूरा हो जाता है और मर जाता है।

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मृदुरोमिल

मृदुरोमिल

यह रोग नर्सरी में बहुत गंभीर होता है, और खेत में रोपण में भी दिखाई दे सकता है। उच्च आर्द्रता की अवधि के दौरान, पत्तियों और टहनियों की निचली सतह पर हल्के भूरे रंग के पॉवडरी धब्बे दिखाई देते हैं।

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पत्त्ति का धब्बेदार रोग

पत्त्ति का धब्बेदार रोग

प्रारंभिक अवस्था के दौरान पत्ती की सतह पर छोटे गहरे पीले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो बाद में पीले घेरे से घिरे संकेंद्रित छल्लो में बढ़ जाते हैं। गंभीर मामलों में, पूरा पौधा मुरझा जाता है।

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शारीरिक विकार

शारीरिक विकार

व्हिप्टेल: नवगठित पत्तियों चमड़े की तरह दिखने लगती है और अनियमित आकर की हो जाती है, और केवल मध्य शिरा शेष रह जाती है। यह पौधों में मोलिब्डेनम की कमी के कारण होता है।

नियंत्रण: मोलिब्डेनम @ ४०० - ६०० किग्रा प्रति एकड़ रोपाई से पहले मिट्टी में मिला दे जिसे रोग का प्रभाव कम हो जाता है। ०.०१ % अमोनियम मोलिब्डेट घोल का घोल बनाकर पत्तियों पर छिड़काव करेने से भी नियंत्रण में मदत होगी।

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ब्राउनिंग हेड: सबसे पहले, कलियों के गुच्छों पर पानी से लथपथ क्षेत्र दिखाई देते हैं जो बाद में गुलाबी या जंग लगे -भूरे रंग में बदल जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप फल सड़ जाते हैं। सिर का भूरा होना पौधों में बोरॉन की कमी के कारण होता है।

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नियंत्रण : बोरेक्स या सोडियम बोरेट ८ किलो प्रति एकड़ की दर से मिट्टी में डालने से इस विकार से बचाव होता है। ०.२५ - ०.५ % बोरेक्स का घोल बना कर पत्तियों पर छिड़काव करना बहुत प्रभावी होता है, खासकर जब कमी अधिक हो।

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कटाई और उपज

कटाई और उपज

जैसे ही ब्रोकली बिक्री योग्य आकार के हो जाते हैं, यानी १० -१५ सेंमी लंबे तब तने को तेज चाकू से काटा जाना चाहिए। फल गठिला हरा होना चाहिए । यदि कटाई में देरी होती है, तो कलियों के गुच्छे ढीले हो जाते हैं। गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए फल के सिर को नियमित रूप से उठाया जाना चाहिए। इसके अलावा, ब्रोकली लंबे समय तक संग्रहीत नहीं किया जा सकता इसलिए परिवहन जल्दी करना चाहिए , कटाई के १० -१२ दिनों के बाद अंकुर फिर से कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। किस्म के आधार पर एक से अधिक कटाई से प्रति एकड़ ४० - ६० क्विंटल की औसत उपज प्राप्त की जा सकती है।

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कटाई के बाद

कटाई के बाद

कटाई के बाद फलो को गुणवक्ता के आधार पर वर्गीकृत किया जाना चाहिए, और टोकरियों में पैक किया जाना चाहिए, और बाजारों में भेजा जाना चाहिए। उन्हें ४°C पर ठंडा किया जाना चाहिए और फिर टोकरी या ट्रे में बर्फ के साथ पैक किया जाना चाहिए, और ठन्डे स्थान में संग्रहित किया जाना चाहिए। उन्हें ४°C पर ७ -१० दिनों के लिए अच्छी तरह से संग्रहीत किया जा सकता है।

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