पीछे
भारत में औषधीय पौधों की खेती का चलन तेजी से बढ़ रहा है. कम उत्पादन और अधिक मांग के कारण औषधीय पौधों की खेती करने वाले किसान अच्छी कमाई कर सकते है. साथ ही केंद्र और राज्य सरकार भी किसानों की आय बढ़ाने के लिए औषधीय पौधों की खेती को प्रोत्साहित कर रही है,और योग्यता के अनुसार अनुदान राशि भी प्रदान कर रही है।
तुलसी की खेती देश के लगभग सभी हिस्सों में की जा सकती है। तुलसी की खेती कम संसाधन वाली और पानी की कमी की परिस्तिथि होने पर शुष्क क्षेत्रों में भी सीमित सुविधा के साथ की जा सकती है। भारत में तुलसी की खेती सभी भागो में आसानी से की जा सकती हैं। वैसे तो तुलसी एक लाभदायक फसल है, लेकिन उसे जहां अन्य फसलों की खेती संभव नहीं हो वहां भी आसानी से किया जा सकता है। तुलसी की खेती आम, निम्बू, आंवला जैसी फसलों के साथ अंतरफसल के रूप में कि जा सकती है, तुलसी के पौधे की यह विशेषता होती है, की इसमें किसी भी प्रकार के किट और रोग जल्दी नहीं लगते।
तुलसी की किस्में
तुलसी की किस्में

मुख्य रूप से तुलसी रंग के आधार पर तीन प्रकार की होती है काली, हरी और नीली बैगनी पत्तियों वाली इसके कुछ विशेष प्रकार इस प्रकार है
1.अमृता (श्याम) तुलसी
1.अमृता (श्याम) तुलसी
ये किस्म पूरे भारत में मिलती है। इसके पत्तों का रंग गहरा जामुनी होता है। इसके पौधे अधिक शाखाओं वाले होते हैं। तुलसी की इस किस्म का इस्तेमाल कैंसर, डायबिटीज, पागलपन, दिल की बीमारी और गठिया सम्बन्धी रोगों में अधिक होता है।


2.रामा तुलसी
2.रामा तुलसी
गर्म मौसम वाली इस किस्म को दक्षिण भारतीय राज्यों में ज़्यादा उगाते हैं। इसके पौधे दो से तीन फ़ीट ऊँचे होते हैं। पत्तियों का रंग हल्का हरा और फूलों का रंग सफ़ेद होता है। इसमें ख़ुशबू कम होती है। ये औषधियों में ज़्यादा काम आती है।


3. काली तुलसी
- काली तुलसी
इसकी पत्तियों और तने का रंग हल्का जामुनी होता है और फूलों का रंग हलका बैंगनी। ऊँचाई तीन फ़ीट तक होती है। इसे सर्दी-ख़ाँसी के बेहतर माना जाता है।


4. कपूर तुलसी
- कपूर तुलसी
ये अमेरिकी किस्म है। इसे चाय को ख़ुशबूदार बनाने और कपूर उत्पादन में इस्तेमाल करते हैं। इसका पौधा करीब 3 फ़ीट ऊँचा होता और पत्तियाँ हरी और बैंगनी-भूरे रंग के फूल होते हैं।


5. बाबई तुलसी
- बाबई तुलसी
ये सब्जियों को ख़ुशबूदार बनाने वाली किस्म है। इसकी पत्तियाँ लम्बी और नुकीली होती हैं। पौधों की ऊँचाई करीब 2 फ़ीट होती है। इसे ज़्यादातर बंगाल और बिहार में उगाते हैं।
मिट्टी एवं उचित मौसम
मिट्टी एवं उचित मौसम
तुलसी के पौधे की यह विशेषता है, की इसकी खेती कम उपजाऊ जमीन जहां सिर्फ पानी की निकासी की वयस्था हो और आसानी से की जा सकती है , बलुई दोमट, काली मिट्टी सब से श्रेष्ट होती है। तुलसी की खेती के बारिश शुरू होने पर जुलाई से अगस्त के दरम्यान करनी चाहिए।


खेत की तैयारी
खेत की तैयारी
क्युकी तुलसी के पौधो की बुवाई बारिश के शुरवाती समय पर हो जाना चाहिए, इसलिए खेत की तैयारी जून माह तक हो जाना चाहिए, वैसे तुलसी की खेती के लिए रसायनिक खाद की जरुरत नहीं होती इसलिए खेत तैयार करते समय २ से ३ टन गोबर खाद को २ टन वर्मी कम्पोस्ट मिला कर खेत की २ बार गहरी जुताई करे। और जमीन से ३ सेमी ऊंची उठी क्यारी बनाएं। यदि अतिआवश्यक हो तो मिट्टी परीक्षण के बाद ५० किग्रा यूरिया, २५ किग्रा सुपर फास्फेट, और ८० किग्रा पौटेश का उपयोग प्रति एकड़ कर सकते है।


नर्सरी की तैयारी
नर्सरी की तैयारी
वैसे तुलसी के पौधे सीधे खेतो में बीज रोपण कर भी किया जाता है, लेकिन नर्सरी में पौधे तैयार कर फिर खेतो में लगाना ज्यादा बेहतर होता है, नर्सरी तैयार करने के लिए पौधो की ट्रे का उपयोग करना चाहिए, मिट्टी की तैयारी करते समय १:२०:८० के अनुपात में रेत या नारियल का भूसा, गोबर खाद और मिट्टी का उपयोग करना चाहिए, बीज अधिक गहराई में नहीं लगाना चाहिए, एक एकड़ में रोपाई के लिए २५० - ३०० ग्राम बीज की नर्सरी तैयार करना चाहिए, बीज मान्यता प्राप्त सरकारी संस्था से लेना चाहिए, या किसी विश्वसनीय नर्सरी से तैयार पौधे भी ले सकते है, तुलसी के बीज २००- २५० रुपए प्रति १०० ग्राम और तैयार पौधे २ से ५ रुपए प्रति पौधे के अनुसार ख़रीदे जा सकते है।


रोपाई
रोपाई


रोपाई के लिए पौधे ३ से ४ सप्ताह पुराने ६ से ८ सेमी लम्बे स्वसथ और १० से १५ पत्तियों वाले होने चाहिए, खेतो में रोपाई के लिए ३ से ५ सेमी ऊंची उठी क्यारी बनाना चाहिए, एक आदर्श दुरी के अनुसार दो पंक्ति के बिच ३० से ४० सेमी और पौधो के बिच २० से २५ सेमी की दुरी रखना चाहिए, पौधो को ५ से ६ सेमी की गहराई में लगाना अच्छा होता है, रोपाई शाम के समय करे, और तुरंत हल्की सिचाई प्रदान करे। मौसम और मिट्टी में नमी का ध्यान रखते हुए, अगली सिचाई निर्धारित करे।


खरपतवार नियंत्रण
खरपतवार नियंत्रण
जरुरी होने पर हाथो से खरपतवार समय समय पर हटा दे, या रासयनिक दवा का भी उपयोग कर सकते है।


तुड़ाई
तुड़ाई
वैसे तुलसी की फसल १०० दिनों में पुरणतः तैयार हो जाती है, और तुसली के पौधे के सभी हिस्सों का उपयोग दवा और सौंदर्य प्रसाधन की सामग्री बनाने में किया जाता है, इसलिए यह इस बात पर निर्भय करता है, की किस उद्देश्य से खेती की जा रही है, अगर पत्तियों के लिए खेती की जा रही है तो ३० दिनों बाद पौधो की कटिंग करना शुर करना चाहिए जिसे पत्तियों की संख्या अधिक मिल सके।
तुलसी के पौधो में जामुनी और सफ़ेद रंग के फूल आते है, जिसे मंजरी भी कहते है, यदि पत्तियों की अधिक तुड़ाई की जानी है तो फूलो को शुरवात में ही तोड़ देना चाहिए, बीजो की तुड़ाई के लिए जब फूल सुख कर भूरे रंग के दिखाई दे तो धीरे से तोड़ कर इखट्टा करना कर लेना चाहिए। आखिर में पौधो को जड़ सहित उखाड़ कर एकत्र कर लेना चाहिए, पौधो के किसी भी भाग को सीधे धुप में नहीं सुखाया जाना चाहिए, जहां हल्की धुप छाँव हो ऐसे स्थान पर पौधो के हिस्सों को सुखाना चाहिए।


आसवन
आसवन
तुलसी का तेल पूरे पौधे के आसवन से प्राप्त होता है। इसका आसवन, जल तथा वाष्प आसवन, दोनों विधि से किया जा सकता है। लेकिन वाष्प आसवन सबसे ज्यादा उपयुक्त होता है। कटाई के बाद 4-5 घंटे छोड़ देना चाहिए। इससे आसवन में सुविधा होती है।


अनुबंध खेती और बाजार मूल्य
अनुबंध खेती और बाजार मूल्य
तुलसी की खेती से कम लागत में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है, इसके बीज, पत्तियों, तने और जड़ सभी का व्यापारिक मूल्य होता है, लेकिन इसे सीधे बाजार में नहीं बेचा जा सकता इसलिए खेती करने से पहले इसे बेचने की जानकरी रखना जरुरी होता है, इसलिए देश में कॉन्ट्रक्ट खेती का प्रचलन बढ़ रहा है इसलिए पतंजलि, डाबर, वैद्यनाथ, झंडू जैसी कई कंपनी कॉन्ट्रक्ट खेती करने के लिए किसानो को सुविधा प्रदान करती है, और किसानो और कंपनी के बिच बाय बेक एग्रीमेंट बना कर खेती की जा सकती है। अनुबंध खेती के विषय में आप इंटरनेट से और अधिक जानकारी ले सकते है।
तुलसी का व्यापरिक मूल्य गुणवक्ता के आधार पर पत्तियां ७००० रुपये क्विंटल, बीज ३००० रुपये क्विंटल और तेल ३००० रुपये प्रति लीटर तक मिल सकता हैं। जो कुल लागत से कई गुना अधिक होता है।


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